Seraj Anwar
शहाबुद्दीन का क़ुसूर क्या है?
देश में एक नहीं दो शहाबुद्दीन हैं . एक सैयद शहाबुद्दीन हैं . गया से संबंध है. मृत्युशैया पर हैं . एक हैं मोहम्मद शहाबुद्दीन ग्यारह वर्सों से जेल में बंद हैं. सिवान से आते हैं . दोनो ने देश की राजनीति ( मुस्लिम सियासत) को बदलने का प्रयास किया. देश को ये बर्दाश्त नहीं है. मुस्लिम क्यादत उभरे . सैयद शहाबुद्दीन को जिन्ना की संज्ञा दी गयी मतलब भारत मुख़ालिफ़ , नफ़रत के पात्र. बचे मोहम्मद शहाबुद्दीन , अपराधी ठहरा दिया गया. सैयद शहाबुद्दीन और मोहम्मद शहाबुद्दीन भारतीय राजनीति के नब्ज़ को परख नहीं पाए , उन्हें शाज़िशन जिस रास्ते पर ढकेला गया वे भी उसी रास्ते पर बढ़ते चले गए. नतीजतन, मास में उम्मीद जगाने के बावजूद नेता नहीं बन पाए. आज सैयद शहाबुद्दीन बुरी तरह से बीमार हैं , कोई पुरसानहाल नहीं है. जो लोग मोहम्मद शहाबुद्दीन को अपराधी मानते हैं वे शिच्छाविद सैयद शहाबुद्दीन के साथ खड़ा हुए? असद उद्दीन अवैसी के साथ कहाँ खड़ा है? आज मुसलमानो में मोहम्मद शहाबुद्दीन के अपराधी होने पर ज़ोरदार बहस चल रही है. मेरी समझ भी कहती है कि अपराधी प्रवृति वाले लोग मुसलमानों के नेता नहीं हो सकते. मगर मुसलमानों और भारतीय समाज से मेरा एक सवाल है राजनीति में अपराधी राज कर रहे हैं या नहीं? बालठाकरे से लेकर राजा भैया तक की दास्तान भरी पड़ी है. संजय गांधी और अमीत शाह को भी इसी श्रेणी से जोड़ कर देखा जाता है. तो शहाबुद्दीन पर इतना बवाल क्यों है? बवाल की वजह जानिए. यदि शहाबुद्दीन अपराधी हैं तो पक्के नमाज़ी भी हैं , शराबी नहीं हैं , कबाबी - शबाबी नहीं हैं . सिर्फ़ सिक्के के एक पहलू को उछाला जा रहा है .शहाबुद्दीन का क़ुसूर ये है की सिवान में सैंकड़ों एकड़ भूमि पर एजुकेशनल कैम्पस का बुनियाद रखना चाह रहे थे , कार्यारंभ भी हो चुका था , शासक वर्ग को ये बात चुभ गयी . झगड़े की असल जड़ यही है . उनका क़ुसूर ये भी है की अपने सांसद काल में MP fund का पैसा पाईं पाईं ख़र्च कर रेकार्ड क़ायम कर मिशाल पेश की. क़ुसूर ये भी है कि जल्लाद डाक्टरों की फ़ीस तय कर दी. क़ुसूर ये भी है कि सत्ता की चौखट पर नतमस्तक होने की आदत नहीं है . ख़ुद को रॉबिन हुड से भी ज़्यादा अलेक्ज़ेंडर मानते हैं . प्रस्तिथिवश बात नहीं करते . उन्हें शायद जेल ज़्यादा शूट करता है . मगर मास में ज़बर्दस्त पकड़ है . आज गया से लेकर गोपालगंज, सिवान , दिल्ली , पटना में न्याय दिलाने को लेकर मशाल जुलूस निकल रहे हैं तो शहाबुद्दीन में कोई बात ज़रूर है . जुलूस में शामिल सब अपराधी तो नहीं ही होंगे? वैसे याक़ूब मेनन के जनाज़े में शामिल हज़ारों लोगों को संघ संपोषित मीडिया ने आतंकवादी ही ठहरा दिया , इस रोग का कोई ईलाज नहीं है . दावा के साथ कहा जा सकता है कि शहाबुद्दीन केलिए न्याय माँग रहे अधिकतर लोगों का वास्ता शहाबुद्दीन से ना होगा और ना शहाबुद्दीन उनको जानते होंगे . जेल से रिहाई के दौरान जितने लोग भागलपुर गए उन्हें शहाबुद्दीन ने तो नहीं ही बुलाया होगा ? कोई निमंत्रण पत्र छपने की ख़बर तो कम से कम मुझे नहीं है . नीतीश कुमार के एक मंत्री जेल में शहाबुद्दीन से मिलने गए , शहाबुद्दीन का क्या क़ुसूर है ? हाई कोर्ट ने ज़मानत दे दी , शहाबुद्दीन का क्या क़ुसूर है? उस जज साहब से किसी ने नहीं पूछा (सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं) ज़मानत देने का आधार क्या था. जब शहाबुद्दीन सरकार बचाए , तब अपराधी नहीं . जब शहाबुद्दीन महागठबँधन केलिए सलाखों के पीछे से अपने रसूख़ का इस्तेमाल वोट दिलाये , तब अपराधी नहीं. जब चंदा बाबू अपनी दुकान का उद्घघाटन केलिए साहेब को बुलाये , तब अपराधी नही . जब नक्सल मूव्मेंट ( माले) से स्वर्ण हिन्दुओं को बचाये , तब अपराधी नहीं . आँख देखाए तो अपराधी , शिक्षा की बात करे तो अपराधी . अपने संसदीय छेत्र में नियम क़ानून की बात करे तो अपराधी और सबसे बढ़ कर जब शहाबुद्दीन की ज़रूरत ना हो तो अपराधी . यही क़ुसूर है शहाबुद्दीन का. शहाबुद्दीन को भी चाहिए की रॉबिनहुड की छवि त्याग कर बिहार और मुसलमानो की राजनीति करें . मगर ये उनसे हो पाएगा कि नहीं संदेह है
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