[सेना पर हमलों को रोक पाना मुश्किल - BBC हिंदी]
दिव्या आर्य
संवाददाता, दिल्ली
े
साझा कीजिए
Image copyrightFAROOQ KHAN
भारत प्रशासित कश्मीर के उरी पर हमले में 19 भारतीय जवानों के मारे जाने और पिछले हफ़्ते सेना के नियंत्रण रेखा के पास 'सर्जिकल स्ट्राइक' के दावे के बाद एक बार फिर रविवार रात बारामूला में हमला हुआ है.
भारतीय सेना की उत्तरी कमान ने ट्वीट कर बताया कि "बारामूला में हमला हुआ, हालात काबू में हैं", और वहां पहुंचे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बयान दिया कि "सेना के जवान ऐसी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं".
लेकिन रविवार रात बारामूला में सेना के 46 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कैंप के पास इस हमले में अर्ध सैनिक बल के एक जवान की मौत हो गई, जबकि दो जवान घायल हुए हैं. सेना के भी दो जवान घायल हुए हैं.
बीबीसी से बातचीत में भारतीय सेना के पूर्व जनरल बताते हैं कि ऐसे हमलों को रोक पाना मुश्किल है.
Image copyrightMUKHTAR KHAN
पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता के मुताबिक नियंत्रण रेखा पर हर व़क्त चौक़सी बहुत मुश्किल है.
उन्होंने कहा, "अनिश्चितकालीन समय तक सेना की तैनाती नहीं होनी चाहिए, उससे एक थकान ठहरने लगती है, पिछले कई दशकों से वहां तैनात सेना और सुरक्षा बल 100 प्रतिशत मुस्तैद नहीं हो सकते."
नियंत्रण रेखा पर 13 साल पहले 'बार्ब्ड वायर' लगाई गई थी जो जनरल मेहता के मुताबिक अब उतनी सुरक्षित नहीं रही. हालांकि उसपर सेंसर और रडार लगे हुए हैं.
साल 1999 में करगिल युद्ध के दौरान सेनाध्यक्ष रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक के मुताबिक सैंकड़ों किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा में से घुसपैठ को पूरे तरीके से रोकना बहुत मुश्किल है.
Image copyrightTAUSEEF MUSTAFA
बीबीसी से बातचीत में जनरल मलिक ने कहा, "कोई भी देश पूरे तरीके से तैनाती नहीं कर सकता, इसलिए जहां ख़तरा ज़्यादा होता है वहां सेना की पोस्ट थोड़ी नज़दीक और बाक़ी जगह थोड़ी दूर बनाई जाती हैं."
इसके बावजूद, जनरल मलिक बताते हैं कि जम्मू के मैदानी इलाकों से लेकर 17-18,000 फ़ीट की ऊंचाई पर जानेवाली नियंत्रण रेखा की सुरक्षा के लिए जवानों के साथ ही तकनीक भी अहम् भूमिका रखती है.
पाकिस्तान से लगने वाली भारत की 3,000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा का 1,225 भारत प्रशासित कश्मीर, 1,037 राजस्थान, 553 पंजाब और 508 किलोमीटर गुजरात से गुज़रता है.
2015 में गुरदासपुर और इसी साल पठानकोट में भी हमले हुए थे पर पंजाब से सटी सीमा पर नियंत्रण रेखा जैसी 'बार्ब्ड वायर' तक उप्लब्ध नहीं है.
Image copyrightSTR
पठानकोट हमले के बाद सीमा सुरक्षा और भारत-पाक़िस्तान वाली सीमा में घुसपैठ के हालात समझने के लिए अप्रैल 2016 में सरकार ने एक समिति बनाई और अगस्त में उसकी रिपोर्ट आई.
पूर्व गृह सचिव मधुकर गुप्ता की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट में सुझाव दिए गए कि पंजाब से गुज़रने वाली भारत-पाक़िस्तान सीमा पर लेज़र और सेंसर लगाने के अलावा वहां निगरानी भी और मुस्तैद करने की ज़रूरत है.
भारत, पाकिस्तान और सीमापार चरमपंथ से निपटने के लिए स्ट्रैटेजिक रिस्ट्रेंट यानि संयम की नीति अपनाता रहा है.
1999 में करगिल, 2001 में संसद हमला और 2008 में मुंबई हमले के व़क्त भारत ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन नहीं किया.
जनरल अशोक मेहता के मुताबिक इसका असर फ़ौज के मनोबल पर पड़ता है.
Image copyrightAP
इसके अलावा फ़ौज को भारत प्रशासित कश्मीर में स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल नहीं है.
जनरल मेहता ने कहा, "वहां हालात जैसे बना दिए गए हैं, लोग आतंकवादियों को हीरो मानते हैं, फ़ौज को बैरक्स में रहना पड़ता है क्योंकि बाहर आने से माहौल में तनाव बढ़ सकता है, तो ऐसे में वो ख़ुफ़िया जानकारी कैसे जुटाएंगी और आतंकवादियों से निपटने का काम कैसे करेंगी?"
भारत प्रशासित कश्मीर में आंतरिक अस्थिरता का उल्लेख देते हुए जेनरल मेहता कहते हैं कि इसका असर सुरक्षा बलों पर भी पड़ता है. वहीं द्विपक्षीय स्तर पर बातचीत को लेकर कोई अनुरूपता नहीं है.
एक ओर प्रधानमंत्री मोदी प्रधानमंत्री शरीफ़ को शपथ ग्रहण के लिए न्योता देते हैं और ख़ुद वहां पाकिस्तान जाते हैं.
दूसरी ओर हुर्रियत का हवाला देकर बातचीत रद्द होती है और पठानकोट हमले के बाद आईएसआई को आने दिया जाता है.
Image copyrightREUTERS
जनरल वी पी मलिक के मुताबिक दोनों देशों के बीच बातचीत पाकिस्तानी सेना के हक़ में नहीं है क्योंकि ये उनके देश में उनके रसूख़ को कम करेगा.
पर वो दावा करते हैं कि पाकिस्तान के मुकाबले भारतीय सेना के पास बेहतर तकनीक और हथियार हैं. फिर भी चरमपंथी गुटों की चुनौती अलग ही है.
वो कहते हैं, "इन गुटों को ना सिर्फ़ पाकिस्तानी सेना से मदद मिलती है, बल्कि उनके पास देश-विदेश से बहुत पैसा मिलता है जिससे हथियार और बाक़ि असला आराम से ख़रीदा जा सकता है.
http://www.bbc.com/hindi/india-37541973
No comments:
Post a Comment