सिस्टम की खराबी की वजह से इन्साफ मिलने में हो रही देर (सलमान खुर्शीद)

सिस्टम की खराबी की वजह से इन्साफ मिलने में हो रही देर  (सलमान खुर्शीद)

 नै दिल्ली ,कांग्रेस के सिनिअर लीडर 2 3 मई 2013 (यू एन आई) कांग्रेस के सिनिअर नेता और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने आज स्वीकार किया है के सिस्टम में ऐसी  खराबी  मौजूद है जिसके कारण आतंकी वारदातों  को अंजाम देने के नाम पर जेलों में बंद बेगुनाहों को इन्साफ मिलने में दिक्क़त हो रही ,ताहम उन्होंने दावा  किया है के उनकी सरकार हर आदमी को इन्साफ दिलाने के ओने अहद पर कायम है और इसके लिए हर मुमकिन कोशिश भी कर रही है . जनाब खुर्शीद पुलिस की हेरासत में खालिद मुजाहिद की मौत और उससे पूर्व के दुसरे मामलों के हवाले स्व पूछे गए सवाल का जवाब दे रहे थे  , उन्होंने कहा के   एन आई ए  की स्थापना इसी मकसद के तेहत किया गया है ताके बेगुनाहों को इन्साफ मिल सके ,उन्होंने दवा किया है के इसके अच्छे रिजल्ट भी सामने आने भी लगे हैं . जिनका इससे पहले नोकसान हो चुका उनपर अब वह सिर्फ अफ़सोस ही कर   सकते  हैं  . खालिद के  के हवाले से जनाब खुर्शीद ने कहा के इस मामले को मुसलामानों के नजरिये से नहीं बलके मानवाधिकार के हवाले से उठाने की जरुरत है .उनहोंने यह भी कहा के इस मामले पर तमाम सियासी पार्टियों को पार्टी स्तर  से ऊपर उठ करसोंचना चाहिए .एक सवाल के जवाब में जनाब खुर्शीद ने कहा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में किसी मामले को जिस तरह बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है वह बेलासुबहा  एक संगीन और खतरनाक मसला है लेकिन सरकार के पास इस पर लगाम लगाने के लए फिलहाल कोई मैकेनिज्म अथवा तरीका मौजूद नहीं . जानाब खुर्शीद  उर्दू पत्रकारों के साथ विशेष भेंट वार्ता में उपरोक्त बातें कही।  (पिन्दार उर्दू पटना दिनांक 24/05/2013 page number .7)  www.biharbroadcasting.com

भेद भाव के कारण मुसलमानों में बढ़ रही असुरक्षा की भावना (काटजू) मुसलामानों को बदनाम करनेवालों क्व खेलाफ जस्टिस काटजू ने की बेबाक आलोचना सहारनपुर 1 7 मई (एजेंसी प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मारकंडे काटजू ने गुजिस्ता दिनों एक सिम्पोजियम को खेताब करते हुए खुले तौर पर इस बात और इस सच्चाई को स्वीकार किया था के मुसलामानों के खेलाफ इम्तेयाजी सलूक अथवा भेदभावपूर्ण रवैया के कारण मुसलामानों में असुरक्षा की भावना बढ़ा है और इसी के साथ उनहोंने मीडिया को लताड़ा भी था के वह मुस्लिम कम्युनिटी के खेलाफ बेहूदा रिपोर्टिंग करके उनके किरदार अथवा छवी को संदेहास्पद बना रहा और वह अपनी गैर जिम्मेदाराना से पूर्ण पत्रकारिता के जरिये उनके हौसले को पस्त भी कर रहा है . जनाब जस्टिस काटजू ने कहा है के ये एक ऐसी हरकत है के जिसके खेलाफ आवाज उठाने की असल जरुरत है .


भेद भाव  के कारण मुसलमानों में बढ़ रही असुरक्षा की भावना (काटजू)
मुसलामानों को बदनाम करनेवालों क्व खेलाफ जस्टिस काटजू ने की बेबाक आलोचना
सहारनपुर 1 7  मई (एजेंसी
प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मारकंडे काटजू ने गुजिस्ता दिनों एक सिम्पोजियम को खेताब करते हुए खुले तौर पर इस बात और इस सच्चाई को स्वीकार किया था के मुसलामानों के खेलाफ इम्तेयाजी सलूक अथवा भेदभावपूर्ण रवैया के कारण मुसलामानों में असुरक्षा की भावना बढ़ा है और इसी के साथ उनहोंने मीडिया को लताड़ा भी था के वह मुस्लिम कम्युनिटी के खेलाफ बेहूदा रिपोर्टिंग करके उनके किरदार अथवा छवी को संदेहास्पद बना रहा और वह अपनी गैर जिम्मेदाराना से पूर्ण पत्रकारिता के जरिये उनके हौसले को पस्त भी कर रहा है . जनाब जस्टिस काटजू ने कहा है के  ये एक ऐसी हरकत है के जिसके खेलाफ आवाज उठाने की असल जरुरत है .
   

           
 इससे पूर्व जस्टिस काटजू ने अपने बेबाक बयानात में हर उस हिन्दुस्तानी फिरका की हेमायत में प्रेस की जमकर मुखालेफत की है के जिनको प्रेस अपने मुफाद के लिए और अपनी चटपटी सुर्ख़ियों के लिए इस्तेमाल कर रहा है , उन्होंने कहा के जब कभी भी कोई भी बम धमाका होता है तो एक घंटे के अन्दर हमारे मुल्क के बहुत सारे टी वी चैनेल ये दिखाना शुरू कर देते हैं के इंडियन मुजाहेदीन जैश मोहम्मद  या हरकतुल मुजाहेदीन , हरकते जिहाद इस्लामी या फिर किसी और कथीत मुस्लिम संगठनों ने इस बम धमाके की जम्मेदारी काबुल करने के लिए एस एम् एस भेजा है और इसी एस एम् एस को बुनियाद बनाकर राष्ट्रीय मीडिया अल्पसंख्यक तबका को अपने टी वी चैनलों के जरिये डराना शुरू कर देता है . जस्टिस काटजू ने मज्र्र्द कहा के एक इ मेल या एस एम् एस कोई भी असामाजिक तत्व भेज सकता है ,लेकिन जब आप टी वी पर या फी अगले दिन प्रिंट मीडिया में इसको इस तरह से दिखाना शुरू कर डरते हैं मानो तमाम मुसलमान आतंकवादी होते हैं ,और वह बम फेंकने के अलावा कुछ नहीं करते ?आप पुरे मुस्लिम समाज की हौसले को पस्त और मुस्लिम समाज को अपने इस गलत काम से बदनाम कर देते हैं और देश में समप्रदाइक्ता का जहर घोल देते हैं .जनाब मारकंडे काटजू इंग्लिश दैनिक हिन्दू के बैनर तले  " रिपोर्टिंग टेरर मीडिया किस तरह संजीदा है "पर एक सिम्पोजियम को संबोधित करते हुए पिछले दिनों अपने बेबाक लहजे में ये भी  कहा था के देश की राष्ट्रीय मीडिया का गैर जिम्मेदाराना हरकत मुल्क में फिरकापरस्ती को बढ़ावा दे रहा है ?जनाब काटजू न कहा था के ये नहायत बेहूदा हरकत है मैंने इस हरकत के खेलाफ आवाज़ बुलंद  की है  , लेकिन वह कहते हैं के मई मीडिया को दबा रहा हूँ ये खेयाल जाहिर करते हुए के मीडिया को एख्लाकियात का पाबन्द होना चाहिए और अपनी कौमी अथवा राष्ट्रीय जिम्मेदारी को जेहन नशीं करना चाहिए . जस्टिस काटजू ने आगे कहा था वह देश में अमन व भाई चारा देश की सुरक्षा और मीडिया की आजादी को बेहतर तौर से देखना चाहते हैं ,लेकिन वह ऐसी मीडिया को बिल्कुल पशंद नहीं करते जो देश की सुरक्षा , और देश की भाई चारा के लिए खतरनाक हो .

उर्दू दैनिक पिन्दार पटना दिनांक 18/05/2013 पृष्ट नंबर 6 से लिया गया है .   www.biharbroadcasting.com 

www.biharbroadcasting.com: Afroz Alam Sahilमैं सोच रहा हूं कि सरकार को एक ऐस...

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Afroz Alam Sahilमैं सोच रहा हूं कि सरकार को एक ऐस...
: Afroz Alam Sahil मैं सोच रहा हूं कि सरकार को एक ऐसा कानून बना देना चाहिए कि जो भी मुसलमान आतंकवादी घटनाओं के नाम पर गिरफ्तार हो, उसे ...

मैं सोच रहा हूं कि सरकार को एक ऐसा कानून बना देना चाहिए कि जो भी मुसलमान आतंकवादी घटनाओं के नाम पर गिरफ्तार हो, उसे तुरंत फांसी दे दी जाए... आखिर इतने सालों तक किसी को जेल में रखने से फायदा क्या... कोर्ट का महत्वपूर्ण समय भी बर्बाद होता है... और ज़्यादातर मामलों में कोर्ट इन्हें बेगुनाह ही साबित कर देती है... बेचारे हमारे पुलिस वालों को कुछ ज़्यादा ही मेहनत करनी पड़ जाती है... अब किसी को होशियारी के साथ जान से मारना भी तो मेहनत का काम है ना... कितना दिमाग लगाना पड़ता होगा... इन पुलिस वालों को तो अवार्ड दिया जाना चाहिए कि कहीं तो यह अपना दिमाग लगाते हैं...
I am thinking that the Government should make a law that Muslims were arrested in the name of terrorist events, gave him instant executions. ... After all these years in prison up to benefit from ... The Court is also significant time waste ... And in most cases the Court gives them guiltless who misuses the same proven ... Poor have only our policemen more hard work is need ... Now anyone with a life even harder to kill than intelligently work right ... How does the brain will find ... These policemen should the award that it spend your mind ... (Translated by Bing)
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भावनाभेदभाव के कारण मुसलमानों में बढ़ रही असुरक्षा की भावना ,ऐसी मीडिया को बिल्कुल पशंद नहीं करते जो देश की सुरक्षा , और देश की भाई चारा के लिए खतरनाक हो (काटजू)

भावनाभेदभाव के कारण मुसलमानों में बढ़ रही असुरक्षा की भावना (काटजू)
मुसलामानों को बदनाम करनेवालों क्व खेलाफ जस्टिस काटजू ने की बेबाक आलोचना
सहारनपुर 1 7  मई (एजेंसी
प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन मारकंडे काटजू ने गुजिस्ता दिनों एक सिम्पोजियम को खेताब करते हुए खुले तौर पर इस बात और इस सच्चाई को स्वीकार किया था के मुसलामानों के खेलाफ इम्तेयाजी सलूक अथवा भेदभावपूर्ण रवैया के कारण मुसलामानों में असुरक्षा की भावना बढ़ा है और इसी के साथ उनहोंने मीडिया को लताड़ा भी था के वह मुस्लिम कम्युनिटी के खेलाफ बेहूदा रिपोर्टिंग करके उनके किरदार अथवा छवी को संदेहास्पद बना रहा और वह अपनी गैर जिम्मेदाराना से पूर्ण पत्रकारिता के जरिये उनके हौसले को पस्त भी कर रहा है . जनाब जस्टिस काटजू ने कहा है के  ये एक ऐसी हरकत है के जिसके खेलाफ आवाज उठाने की असल जरुरत है .
   
           
 इससे पूर्व जस्टिस काटजू ने अपने बेबाक बयानात में हर उस हिन्दुस्तानी फिरका की हेमायत में प्रेस की जमकर मुखालेफत की है के जिनको प्रेस अपने मुफाद के लिए और अपनी चटपटी सुर्ख़ियों के लिए इस्तेमाल कर रहा है , उन्होंने कहा के जब कभी भी कोई भी बम धमाका होता है तो एक घंटे के अन्दर हमारे मुल्क के बहुत सारे टी वी चैनेल ये दिखाना शुरू कर देते हैं के इंडियन मुजाहेदीन जैश मोहम्मद  या हरकतुल मुजाहेदीन , हरकते जिहाद इस्लामी या फिर किसी और कथीत मुस्लिम संगठनों ने इस बम धमाके की जम्मेदारी काबुल करने के लिए एस एम् एस भेजा है और इसी एस एम् एस को बुनियाद बनाकर राष्ट्रीय मीडिया अल्पसंख्यक तबका को अपने टी वी चैनलों के जरिये डराना शुरू कर देता है . जस्टिस काटजू ने मज्र्र्द कहा के एक इ मेल या एस एम् एस कोई भी असामाजिक तत्व भेज सकता है ,लेकिन जब आप टी वी पर या फी अगले दिन प्रिंट मीडिया में इसको इस तरह से दिखाना शुरू कर डरते हैं मानो तमाम मुसलमान आतंकवादी होते हैं ,और वह बम फेंकने के अलावा कुछ नहीं करते ?आप पुरे मुस्लिम समाज की हौसले को पस्त और मुस्लिम समाज को अपने इस गलत काम से बदनाम कर देते हैं और देश में समप्रदाइक्ता का जहर घोल देते हैं .जनाब मारकंडे काटजू इंग्लिश दैनिक हिन्दू के बैनर तले  " रिपोर्टिंग टेरर मीडिया किस तरह संजीदा है "पर एक सिम्पोजियम को संबोधित करते हुए पिछले दिनों अपने बेबाक लहजे में ये भी  कहा था के देश की राष्ट्रीय मीडिया का गैर जिम्मेदाराना हरकत मुल्क में फिरकापरस्ती को बढ़ावा दे रहा है ?जनाब काटजू न कहा था के ये नहायत बेहूदा हरकत है मैंने इस हरकत के खेलाफ आवाज़ बुलंद  की है  , लेकिन वह कहते हैं के मई मीडिया को दबा रहा हूँ ये खेयाल जाहिर करते हुए के मीडिया को एख्लाकियात का पाबन्द होना चाहिए और अपनी कौमी अथवा राष्ट्रीय जिम्मेदारी को जेहन नशीं करना चाहिए . जस्टिस काटजू ने आगे कहा था वह देश में अमन व भाई चारा देश की सुरक्षा और मीडिया की आजादी को बेहतर तौर से देखना चाहते हैं ,लेकिन वह ऐसी मीडिया को बिल्कुल पशंद नहीं करते जो देश की सुरक्षा , और देश की भाई चारा के लिए खतरनाक हो .
उर्दू दैनिक पिन्दार पटना दिनांक 18/05/2013 पृष्ट नंबर 6 से लिया गया है .   www.biharbroadcasting.com 


Sunday, January 23, 2011

क्या बिहार में सुशासन है ?

कहा जाता है के पिछले ५ सालों में बिहार की कानून वेवस्था बहुत चुस्त और दुरुस्त रही है, मगर १ आर .टी आई आवेदन से जो खुलासा हुआ है वह चौकाने वाली है

की sahi tashwir १.01.2005 से १.01 2009 yaani sirf 4 सालों में वह bhi sirf १ jila में MDM yaani madhyahan भोजन की कुल ६० चोरी की घटना घटित हुई,अब आप समझ सकते हिं के सिर्फ एक तरह की चोरी केवल ४ सालों में सिर्फ एक जिला में ६० है dakaiti ,अपहरण बालात्कार,रंगदारी , जैसे और भी parakaar की घटनाओं को मिलकर कितनी घटायें हुई होंगी, अंदाजा lagaya jasakta है.

Longon ko ab lagne laga hai ke bihar mein hone waali ghatnaaon media ne aawaam ke smne pesh sarad nahi hi, bharashtachat ke barey mein to kahne ki jarurat to kisi ko nahi ,wah to jagjahir hai.

RTI ke aawedan se is baat ka bhi khulasa huaa ke ,mdm ke 60 chori ki ghatnaon me sirf

2maamle mein aarop patra dayar karne mein police ko kamyabi mili .jo bihar ki qabil mani jane wali police ko kaghere mein lakhara karney ke liye kaafi hai.

 

सच बात तो ये है के चाहे वह नीतीश हों या लालू दोनों ने टोपी पहन, मुसलामानों को टोपी पहनाया है।

आज जिन लोगों का पेट भर जा रहा ,वह यही समझ रहे के सारी दिया का पेट भर चूका , यानी वह भूके तो साड़ी दुया भूखी, उनकी भूख ख़त्म तो साड़ी दुनिया का पेट फुल , भले ही ऐसे  लोगों का परोसी भूख से तड़पकर तड़पकर  कर  दम क्यों न  तोड़ दे , इस तरह की सोंच जब  कम पढ़े ,-लिखे लोग जब सोंचे तो कोई ताजुब नहीं होगी मगर यही सोंच जब एक पढ़ा लिखा तबका बोलने लगे तो तब आप क्या कहेंगे ?

                       वर्तमान सरकार में जनता    बदहाली , और बदतर जिंदगी गुजारने पे मजबूर क्यों न  हों ,सरकार के चापलुशों को  ये बदहाली बिलकुल दिखाई नहीं दे रही , वह दलील दे रहे हैं के बिलकुल हक न मिलने से अधुरा हक मिलना अच्छा है , ऐसी दलील  कोई  आम आदमी का नहीं बलके उस उर्दू अखबार के मालिक सह मुख्य  सम्पादक का है , जिसे बिहार सरकार ने मुसलामानों के  बीच सरकार की चाप्लोसी और वोट बैंक बनाने की ठीकेदारी करने के लिए  विज्ञापन के तौर पर कड़ोरों रूपये  दिए थे , आज भी  दे रहे हैं , मगर सवाल पैदा होता है के क्या वाकई में गरीबों को पुरे हक के बदले अधूरे हक भी  बगैर जेबें ढीली किये  और परिशानी उठाये  मिल  रहीं हैं ? या शब्दों से खेलने वाले सरकार के चाप्लुश सरकार के सामने सुरखुरू बनकर गरीब जनता को धोके में डाल अपनी तिजोड़ी भरने के लिए ऐसी बेतुकी दलील पेश कर रहे ?वर्तमान सरकार में  गरीबों का हाल क्या है  चंद उदाहरणों  से अच्छी तरह समझा जा सकता है ,

            केंद्रीय सरकार और प्रदेश सरकार के जरिये गरबों के उत्थान के लिए लगभग 2 दर्जन से जेयादा कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रहीं मगर भेद भाव , भ्रष्टाचार के कारण हाल ही में पटना के फुलवारी शरीफ में एक गरीब औरत ने अपने 6 माह के दूध पीते  बच्चे को अपने पति के इलाज कराने हेतु बेच दी , जिसे साड़ी दुनिया ने देखा , दर्जानों कल्याणकारी योजनाओं के रहते कोई गरीब भूखे मरने लगे,अपने दूध पीते  बच्चे को बेचने पे मजबूर हो जाए तब ऐसी साकार के बारे में आपका क्या खेयाल रहेगा ?और ऐसी सरकार की चप्लोशी करने वालों के बारे में आप क्या सोंचेंगे ? बिहार के बिहार शरीफ में ,2011 में विभिंव  आँगनबाड़ी  केन्द्रों के लिए  सेविकाओं की  लगभग 9 5  बहालियाँ हुईं , मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है के अकलियतों के मसीहा कहलाने का दावा करने वाली नितीश सरकार ने 9 5  बहालियों में एक भी मुसलमान को बहाल नहीं किया , क्या 9 5  बहालियों में एक भी मुसलमान को बहाल न करना ये कौन सी सामाजिक समरसता की पहचान  है ?  क्या मुस्लिम उमीदवारों में एक भी ऐसा उमीदवार नहीं मिला जो आँगनबाड़ी सेविका बन सकती थी ? बिहार के समझदार लोग और नीतीश सरकार पे बारीकी से नजर रखने वाले लोग तो कह रहे के जब वर्तामान सरकार फोर्थ ग्रेड की नोकड़ी देने में सीन पे सांप लोट रही और कलेजा फट रही तो बी पी एस सी से बहाल होने वाले उच्च पदों की बहालियों में मुस्लिम उमीदवारों के साथ किस हद तक नाइंसाफी होती होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। कटिहार जिला से खबर आई थी के वहाँ एक मिडिल स्कूल है , जहां चार सौ उर्दू पढ़ने वाले छात्र हैं  मगर उर्दू पढ़ाने वाले शिक्षक सिर्फ एक , जरा गौर से जात पात और धर्म का चश्मा उतारकर सोंचिये नौ सौ छात्रों  पे जहाँ केवल  एक शिक्षक बहाल हों वहां से पढ़ने  बच्चों का भविष कैसा होगा ? अंदाजा लगाया जा सकता है , जनके  उन्ही का बनाया हुआ  कानून कहता है , 3 0  छात्रों पे एक शिक्षक तो फिर 9 0 0  उर्दू पढ़ने वाले छात्र होने के बावजूद केवल एक शिक्षक क्यों ? जबके आप सभी को पता होगा नीतीश कुमार उर्दू  भाषा की देश की आजादी में योगदान और इस बेश कीमती जुबान की तरक्की की बखान किस तरह से करते रहे हैं ,किसी से छुपी हुई नहीं है , सवाल पैदा होता है के नीतीश कुमार के बयान और उनके काम में इतना बड़ा फर्क क्यों ?क्या राज के एक बहुत बड़े समुदाय को नीतीश सरकार खामोशी के साथ समाज के नीचले  सतह पे पहुंचाने का काम कर रही , और दूसरी तरफ उसी समुदाय के जमीर फरोश लोगों की मुहमांगी मुराद पूरी कर अपना छवी भी बनाये रखना चाह
रही ? चौतिश हाजार पाँच सौ चालीश ट्रेंड शिक्षकों की बहलियाँ कुछ दिनों पहले हुई , जिसमें 1 2 हजार उर्दू शिक्षक के पद थे , कहा जाता है के  मुसलमानों को छांटने के लिए उन्हों ऐसी ऐसी नियमों को जान बुझकर बनाया गया ताके  उन शर्तों को पूरा करने वाले उमीदवार ही उतने संख्या में न मिले .जहाँ तक बात है सम्प्रदाइक सौहार्द की तो आंकड़े यही कह रहे के लालू राबड़ी के पन्द्रह साला हुकूमत में जितने दंगे और तनाव नहीं हुए , उससे दस गुना से भी जेयादा छोटे मोटे दंगे और इन दंगों में मुसलामानों को भाड़ी कीमत चुकानी पड़ी ,शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता होगा के रेयासते बिहार में छोटे मोटे तनाव की खबरे न आती हों .
आज नीतीश कुमार की सरकार ये बात दावे के साथ नहीं कह सकती के बिहार में हुए शिक्षक बहाली चाहे, पहला चरण हो ,या दूसरा किसी मुखिया ने बगैर रिश्वत लिए किसी की बहाली कर दी हो .चाहे मनरेगा में बिहार के अफसर और मुखिया रियासत के गरीबों के हक पे नाजायज तरीके से न लूट रहे हों , क्या बिहार सरकार के मुखिया को पता नहीं ? के हमारे राज में क्या हो रहा ?
            कुछ लोग लालू यादव  के जरिये परिवर्तन रैली में , टोपी पहन कर भाषण देने पर निशाना  साधते हुए जैसा के एक चप्लुश उर्दू मीडिया  के मुख्य संपादक ने दिनांक 17/05/2013 के एक लेख में लिखा के " टोपी पहनने से कोई मुसलामानों का हमदर्द नहीं हो जाता है " उनकी बातें सही हैं लेकिन ये बात और ड्रामा तब क्यों नहीं दीखी या दिखती है जब नीतीश कुमार मुसलमानों को टोपी पहनाने के लिए टोपी और हरी पगरी और मजार का सहारा लिया ? कहाँ थे ऐसे लोग ?नीतीश कुमार ने पिछले आठ सालों में टोपी  पहन कर मुसलमानों को किस तरह टोपी पहनाया क्या नजर नहीं आई ? सच  बात तो ये है के  चाहे वह नीतीश हों या लालू दोनों ने टोपी पहन, मुसलामानों को टोपी पहनाया है।
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सच बात तो ये है के चाहे वह नीतीश हों या लालू दोनों ने टोपी पहन, मुसलामानों को टोपी पहनाया है .

आज जिन लोगों का पेट भर जा रहा ,वह यही समझ रहे के सारी दिया का पेट भर चूका , यानी वह भूके तो साड़ी दुया भूखी, उनकी भूख ख़त्म तो साड़ी दुनिया का पेट फुल , भले ही ऐसे  लोगों का परोसी भूख से तड़पकर तड़पकर  कर  दम क्यों न  तोड़ दे , इस तरह की सोंच जब  कम पढ़े ,-लिखे लोग जब सोंचे तो कोई ताजुब नहीं होगी मगर यही सोंच जब एक पढ़ा लिखा तबका बोलने लगे तो तब आप क्या कहेंगे ?

                       वर्तमान सरकार में जनता    बदहाली , और बदतर जिंदगी गुजारने पे मजबूर क्यों न  हों ,सरकार के चापलुशों को  ये बदहाली बिलकुल दिखाई नहीं दे रही , वह दलील दे रहे हैं के बिलकुल हक न मिलने से अधुरा हक मिलना अच्छा है , ऐसी दलील  कोई  आम आदमी का नहीं बलके उस उर्दू अखबार के मालिक सह मुख्य  सम्पादक का है , जिसे बिहार सरकार ने मुसलामानों के  बीच सरकार की चाप्लोसी और वोट बैंक बनाने की ठीकेदारी करने के लिए  विज्ञापन के तौर पर कड़ोरों रूपये  दिए थे , आज भी  दे रहे हैं , मगर सवाल पैदा होता है के क्या वाकई में गरीबों को पुरे हक के बदले अधूरे हक भी  बगैर जेबें ढीली किये  और परिशानी उठाये  मिल  रहीं हैं ? या शब्दों से खेलने वाले सरकार के चाप्लुश सरकार के सामने सुरखुरू बनकर गरीब जनता को धोके में डाल अपनी तिजोड़ी भरने के लिए ऐसी बेतुकी दलील पेश कर रहे ?वर्तमान सरकार में  गरीबों का हाल क्या है  चंद उदाहरणों  से अच्छी तरह समझा जा सकता है ,

            केंद्रीय सरकार और प्रदेश सरकार के जरिये गरबों के उत्थान के लिए लगभग 2 दर्जन से जेयादा कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रहीं मगर भेद भाव , भ्रष्टाचार के कारण हाल ही में पटना के फुलवारी शरीफ में एक गरीब औरत ने अपने 6 माह के दूध पीते  बच्चे को अपने पति के इलाज कराने हेतु बेच दी , जिसे साड़ी दुनिया ने देखा , दर्जानों कल्याणकारी योजनाओं के रहते कोई गरीब भूखे मरने लगे,अपने दूध पीते  बच्चे को बेचने पे मजबूर हो जाए तब ऐसी साकार के बारे में आपका क्या खेयाल रहेगा ?और ऐसी सरकार की चप्लोशी करने वालों के बारे में आप क्या सोंचेंगे ? बिहार के बिहार शरीफ में ,2011 में विभिंव  आँगनबाड़ी  केन्द्रों के लिए  सेविकाओं की  लगभग 9 5  बहालियाँ हुईं , मगर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है के अकलियतों के मसीहा कहलाने का दावा करने वाली नितीश सरकार ने 9 5  बहालियों में एक भी मुसलमान को बहाल नहीं किया , क्या 9 5  बहालियों में एक भी मुसलमान को बहाल न करना ये कौन सी सामाजिक समरसता की पहचान  है ?  क्या मुस्लिम उमीदवारों में एक भी ऐसा उमीदवार नहीं मिला जो आँगनबाड़ी सेविका बन सकती थी ? बिहार के समझदार लोग और नीतीश सरकार पे बारीकी से नजर रखने वाले लोग तो कह रहे के जब वर्तामान सरकार फोर्थ ग्रेड की नोकड़ी देने में सीन पे सांप लोट रही और कलेजा फट रही तो बी पी एस सी से बहाल होने वाले उच्च पदों की बहालियों में मुस्लिम उमीदवारों के साथ किस हद तक नाइंसाफी होती होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। कटिहार जिला से खबर आई थी के वहाँ एक मिडिल स्कूल है , जहां चार सौ उर्दू पढ़ने वाले छात्र हैं  मगर उर्दू पढ़ाने वाले शिक्षक सिर्फ एक , जरा गौर से जात पात और धर्म का चश्मा उतारकर सोंचिये नौ सौ छात्रों  पे जहाँ केवल  एक शिक्षक बहाल हों वहां से पढ़ने  बच्चों का भविष कैसा होगा ? अंदाजा लगाया जा सकता है , जनके  उन्ही का बनाया हुआ  कानून कहता है , 3 0  छात्रों पे एक शिक्षक तो फिर 9 0 0  उर्दू पढ़ने वाले छात्र होने के बावजूद केवल एक शिक्षक क्यों ? जबके आप सभी को पता होगा नीतीश कुमार उर्दू  भाषा की देश की आजादी में योगदान और इस बेश कीमती जुबान की तरक्की की बखान किस तरह से करते रहे हैं ,किसी से छुपी हुई नहीं है , सवाल पैदा होता है के नीतीश कुमार के बयान और उनके काम में इतना बड़ा फर्क क्यों ?क्या राज के एक बहुत बड़े समुदाय को नीतीश सरकार खामोशी के साथ समाज के नीचले  सतह पे पहुंचाने का काम कर रही , और दूसरी तरफ उसी समुदाय के जमीर फरोश लोगों की मुहमांगी मुराद पूरी कर अपना छवी भी बनाये रखना चाह
रही ? चौतिश हाजार पाँच सौ चालीश ट्रेंड शिक्षकों की बहलियाँ कुछ दिनों पहले हुई , जिसमें 1 2 हजार उर्दू शिक्षक के पद थे , कहा जाता है के  मुसलमानों को छांटने के लिए उन्हों ऐसी ऐसी नियमों को जान बुझकर बनाया गया ताके  उन शर्तों को पूरा करने वाले उमीदवार ही उतने संख्या में न मिले .जहाँ तक बात है सम्प्रदाइक सौहार्द की तो आंकड़े यही कह रहे के लालू राबड़ी के पन्द्रह साला हुकूमत में जितने दंगे और तनाव नहीं हुए , उससे दस गुना से भी जेयादा छोटे मोटे दंगे और इन दंगों में मुसलामानों को भाड़ी कीमत चुकानी पड़ी ,शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता होगा के रेयासते बिहार में छोटे मोटे तनाव की खबरे न आती हों .
आज नीतीश कुमार की सरकार ये बात दावे के साथ नहीं कह सकती के बिहार में हुए शिक्षक बहाली चाहे, पहला चरण हो ,या दूसरा किसी मुखिया ने बगैर रिश्वत लिए किसी की बहाली कर दी हो .चाहे मनरेगा में बिहार के अफसर और मुखिया रियासत के गरीबों के हक पे नाजायज तरीके से न लूट रहे हों , क्या बिहार सरकार के मुखिया को पता नहीं ? के हमारे राज में क्या हो रहा ?
            कुछ लोग लालू यादव  के जरिये परिवर्तन रैली में , टोपी पहन कर भाषण देने पर निशाना  साधते हुए जैसा के एक चप्लुश उर्दू मीडिया  के मुख्य संपादक ने दिनांक 17/05/2013 के एक लेख में लिखा के " टोपी पहनने से कोई मुसलामानों का हमदर्द नहीं हो जाता है " उनकी बातें सही हैं लेकिन ये बात और ड्रामा तब क्यों नहीं दीखी या दिखती है जब नीतीश कुमार मुसलमानों को टोपी पहनाने के लिए टोपी और हरी पगरी और मजार का सहारा लिया ? कहाँ थे ऐसे लोग ?नीतीश कुमार ने पिछले आठ सालों में टोपी  पहन कर मुसलमानों को किस तरह टोपी पहनाया क्या नजर नहीं आई ? सच  बात तो ये है के  चाहे वह नीतीश हों या लालू दोनों ने टोपी पहन, मुसलामानों को टोपी पहनाया है। www.biharbroadcasting.com
   

सरबजीत के लिए मुआओजे की बारिश , कतील सिद्दीकी के लिए क्यों नहीं ? (कांग्रेसी नेता आजमी बारी)

सरबजीत के लिए मुआओजे  की बारिश , कतील सिद्दीकी  के लिए क्यों नहीं ? (कांग्रेसी नेता आजमी बारी)


गैर मुल्की जेलों में हिन्दुस्तानी शहरियों की बढ़ती संख्या पर दुःख का इज़हार प्रकट करते हुए बिहार के मशहुर कोंग्रेसी नेता आज़मी बारी ने कहा है के इन दिनों विदेशी जेलों में हिन्दुस्तानियों की तादाद हजारों से ऊपर है ,इसमें जेयदा तरअरब मुल्कों में हैं -जैसे सऊदी अरब में 1691, कुवैत में 1161 ,  यूनाइटेड अरब अमीरात में 1102 , बंगला देश में 167 चीन में 157 सिगापुर में 156 अमेरिका में 155 श्रीलंका में 63 कैदी जेल में बंद हैं .इन लोगों के जेल जाने का कारण छोटे छोटे मामले हैं ,क़ैद होने की वजह नशीली दवाओं की स्मगलिंग , पशिमी देशों में घरेलु हिंसा ,अरब देशों में बेबस मजदूरों के लिए गलत कॉन्ट्रैक्ट के साथ साथ बड़े कारणों में ,बलात्कार , डकैती , गैर कानूनी शारीरिक सम्बब्ध ,ट्रैफिक हादसे ,गैर कानूनी शराब बिक्री वगैरह हैं . एक सुचना के मुताबिक़ मलेशिया , सिंगापुर , पकिस्तान , बाग्लादेश , श्रीलंका में जेयादातर हिन्दुस्तानी शहरियों की गिरफ्तारी की वजह आवर्जन कानून की खेलाफवर्जि है .गैर्मुल्की जेलों में हिन्दुस्तानी शहरियों की तादाद 2005 में 6730 थी जबके 2007 में लगभग 6000 थी . 


                                बारी आजमी ने बताया के पूना  जेल में  क़तील सिद्दीकी की बेरहमी से क़त्ल के बाद , पकिस्तान के लखपत जेल में सरबजीत पर कातिलाना हमला , जम्मू के जेल में पाकिस्तानी शहरी सनाउल्लाह , तेहार जेल में जावेद का क़त्ल इन सब मामलों ने जेल की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा दिया है
 
                              जिस तरह सरबजीत के मामले को मीडिया के जरिये उचल गया , उसके बाद जम्मू जेल की घटना होनी ही थी , सरबजीत की तुलना कुछ अखबारों के जरिये भगत सिंह से करना , और पूना जेल में क़तील सिद्दीकी के मौत पर खामोशी और सरबजीत की मौत पर कोहराम ये सब  ऐसी बातें हैं जिसके खतरनाक नातायेज रोनुमा होंगे . लखपत जेल में ही चमैल सिंह के क़त्ल को हिन्दुस्तानी मीडिया ने संजीदगी से नहीं लिया और शहीद का दर्जा नहीं दिया गया .ऐसी हालत में उसके बेटे दीपक सिंह के जरिये मुआओजे की मांग क्या जाएज नहीं हैं ?
 
                               अगर विदेशी जेल में सजायाफ्ता सरबजीत सिंह को शहीद का दर्जा और डेढ कड़ोड़ मुआओजे की बारिश हो सकती तो अपने ही देश के जेल में शक की बुनियाद पर बंद क़तील सिद्दीकी के क़त्ल पर शहीद का दर्जा और मुआओजे की बारिश क्यों नहीं हो सकती ! जबके क़तील सिद्दीकी  सिर्फ आरोपी था किसी भी अदालत के जरिये कलप्रिट और सजायाफ्ता नहीं था .
           उर्दू  पिन्दार पटना दिनांक 09/05/2013 पृष्ठ नंबर 0 9  से लिया गया है .
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क्या गजरात के मुसलामानों को कभी इन्साफ मील सकेगा ?


                   (अहमद मोहिउद्दीन सिद्दीकी )
                            

2 0 0 2  के फसादात में हजारों मुसलामानों को शहीद कर दिया गया . 2 3 हजार घड़ों को लूटकर आग लगा दी गई 297 मस्जिदों और दरगाहों को ध्वस्त कर दिया गया .राष्ट्रीय राज मार्गों और हाई वेज पर बारह सौ होटलों को निशाना बनाया गया और 350 तिजारती मराकिज लूट मार कर बर्बाद कर दिए गए .
गुलबर्ग सोसाइटी के जले हुए और वीरान बंगलों में मैंने अजीब इज़तेराब महसूस किया , 2 8 फ़रवरी  2002को सुबह को जब सात बजे से शाम 7  बजे तक सरकारी मदद से जिनका क़त्लेआम किया गया .....उन शहीदों की रूहें इन्साफ मांग रही हैं गुलबर्ग सोसाइटी के गेट में दाखील होते ही बाएं तरफ कासिम साहेब का बंगला है ,जिनके 1 9 अफराद शहीद कर दिए गए ,कासीम साहेब उस खानदान के वाहीद अफराद हैं जो उन फसादात में जिन्दा बच गए और वह उस वजह जगह रहने वाले तनहा आदमी हैं ,जो अभी तक डेट हुए हैं ,उस केयामत खेज फसादात का ज़िक्र करते हुए कासीम साहेब की हिचकियाँ बंध गईं और बात चीत को कुछ देर के लिए  मुझे रोक देना पड़ा ..कासिम साहेब बंगला नंबर 2 और उनकी माँ और दुसरे रिश्तेदार बँगला नंबर 1 6  में मुकीम थे .इन दोनों बंगलों में कुल 1 6  लोग रहते थे , जो सब के सब क़त्ल कर दिए गए .कासिम साहेब अपना बंगला बेच कर कहीं और जाना नहीं चाहते ,उन्हें डर है के अगर उनहोंने अपना बंगला बेंच दिया तो उसके अन्दर की मस्जिद शहीद कर दिया जायेगा .गुलबर्ग सोसाइटी में आज भी पाँच वक़्त की नमाज जारी है .कासिम साहेब शायद मायूस और बरहमी (गुस्से)की हालत में कहते हैं के पुलिस कमिशनर पण्डे चाहते तो उस एक छोटी सी बस्ती को आसानी से सुरक्षा प्रदान कर सकते थे .
                                                                                             
                  गुलबर्ग  सोसाइटी के प्रभावितों पर दबाव दाल कर औने पौने उनके बंगले खरीदने की कोशिश की जा रही है ,यहाँ एक बंगले की कीमत लगभग एक कड़ोड़ है .गुलबर्ग सोसाइटी क़त्लेआम केस के अहम् गवाह इम्तेयाज़ खान पठान ,जिन्होंने अदालत में बयान दिया था के वजीरेआला नरेंदर मोदी ने मरहूम मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट एहसान जाफरी के पुलिस तहफ्फुज तलब करने पर उनसे बदकलामी करते हुए पुछा था के "अभी तू ज़िंदा है मरा नहीं " ? इम्तेयाज खान का कहना था के "हमारे साथ जो हुआ हमारे खानदान और गुलबर्ग सोसाइटी वालों और बाकी गुजरात के मुसलामानों का जो क़त्लेआम और जानी माली नुक्सान किया गया उससे मैंने ठान लिया था के अगर हम अदालत  की लड़ाई नहीं लड़ेंगे तो ऐसा दुबारा हो सकता है "इम्तेयाज खान ने बताया के उनपर भी पेट्रोल फेंक दिया गया था ,उन्होंने दूर भाग कर ,पेट्रोल से तर  ब   तर शर्ट उतार कर अपनी जान बचाई .फसादी व बलवाई गुलबर्ग सोसाइटी की गेट से नहीं बलके उसकी दिवार तोड़ कर हजारों की तादाद में अन्दर दाखिल हो गए थे ,इम्तेयाज बंगला नंबर 1 0  में रहते थे और एहसान जाफरी के पड़ोसी थे .उनहोंने इस फसाद में अपने खानदान के 1 0  अफराद खो दिए ,उनकी माँ ,9 2  वर्षीय दादी ,चाचा ,चचेरे भाई,भाउज ,चचेरे भाई का बेटा ,बहु और उनका 5 साल का लड़का सब के सब बेदर्दी से मार दिए गए .इम्तेयाज ने बताया के फसाद में वह और उनके वालिद बच गए .इम्तेयाज के बड़े भाई फिरोज खान पठान तेजारत के सिलसिले में सूरत गए हुए थे ,इसलिए उनकी जान बच गई 
                    इम्तेयाज के दोनों बेटे उर्दू मेडियम से तालीम हासील कर रहे हैं ,हालांके गुजरात में उर्दू का जेयादा चलन नहीं है . इस बारे में इम्तेयाज का कहना था के उर्दू से अगर तालीम हासिल की जाए तो दिन  भी बच्चों में आ जायेगा .फोका और हदीश भी सीख लेंगें और उन्हें मालुम हो जाएगा के इस्लाम कितना कितना बेहतरीन मजहब है।3 5 वर्षीय इम्तेयाज खान पेशे से इलेक्ट्रीशियन हैं .इम्तेयाज विशेष जांच टीम( SIT)  
के रोले से भी सख्त नाराज थे .उनहोंने कहा के मैंने उसके दफ्तर में 1 3 घंटों तक अपना बयान दर्ज करवाया था .उसमें से बाज और ख़ास जरुरी बातों को निकाल दिया गया ,मिशाल के तौर पर एहसान जाफरी और मोदी की बात चीत का  जिक्र नहीं किया गया . SITटीम ने भी आम पुलिस वालों की तरह पक्षपात करते हुए ,पीड़ितों को बचाने की कोशिश में ऐसे पुलिस अफसरों को चुना  जो इशरत जहां फर्जी मुड़भेड़  में शामिल थे .उनहोंने आई जी  गीता जौहरी ,शिवानन्द झा और इंस्पेक्टर गोसवामी गीरी के बारे में शुबहात(शक )का इज़हार किया . .... इम्तेयाज के बड़े भाई फिरोज खान  बी .कॉम हैं और महाना 6,000 रूपये  कम लेते हैं और इम्तियाज की माहाना 7 हजार है ,रियासती और हुकूमत की तरफ से एक आदमी के लिए 5 लाख कम्पंसेसन मिला है ,अपने तहफ्फुज के लिए दोनों भाइयों ने दस साल में दस घर बदले हैं .इम्तियाज ने तो अपनी दाढ़ी भी मुंड वाली है .गुलबर्ग सोसाइटी केस कुल 6 4  आरोपीयों में जिन में 1 0 जेल में हैं और तीन फरार हैं ,हैरत और तशवीश की बात है  ये है के 5 1  आरोपी जमानत पर छोड़ दिए  गए हैं
                          नरौदा पाटिया दंगा :-नरौदा पाटिया दंगा में 1 5 हजार से जेयादा दंगाई 2 8 फ़रवरी 2002 की सुबह 7 बजे हमला शुरू कर दिए ,1 2 घंटो के नंगा नाच के लिए पूरी तैयारी करली थी ,हिथियार की गाड़ी ,पेट्रोल की गाड़ी ,गैस सेलेंड़ेरों से भरी हुई लारी ,उनके साथ थी दंगाई बारी-बारी आते महिलाओं की इज्ज़त लुटते ,लुट मार मचाते ,हत्या करते और घरों को आग लगा देते थे ,थक जाते तो उनकी जगह दुसरे दंगाइयों की टोली आ जाती ,थके हुए दंगाई नाश्ता करके ,शराब पीकर आराम करके फिर लौट आते ..एक दंगाई की बीवी मुसलमान थी ,लेकिन उसे ये एहसास नहीं हुआ के जिस सख्श के साथ वह जिंदगी गुजार रही है ,वह आदमी उसकी कौम का क़त्ल कर रहा है .बी जी पी ने अपने ही काएद के खानदान को नहीं बख्शा .नजीर खान पठान के वक़्त बी जी पी के मुकामी काएद और कार्यकारणी (मज्लिशे शुरा )के रुक्न (सदस्य  थे आज कल नजीर खान इस्लामिक रिलीफ कमिटी के एकरा स्कूल में केमिस्ट्री और बायोलॉजी पढ़ा रहे हैं .अदालत में वह भी साबित क़दम (मुस्तैदी के साथ डेट रहना )रहे ,पहले वह मैथ के टीचर थे .फ़सादियों ने अपने शिक्षक को भी नहीं छोड़ा .2 8 फ़रवरी को फसाद के दिन पुलिस फायरिंग में एक खाली शेल नजीर खान के कान से टकरा करपैर को जख्मी कर गया ,वह भागने के काबिल नहीं रहे इसलिए अपनी बीवी से कहा के वह उनके बेटे और बेटी को कहीं दूर ले जाकर अपनी और उनकी जान बचाले .बेनजीर अपनी जान बचाने के लिए सड़क के किनारे स्थितसाढ़े चार फिट जमीं के निचे पानी के टैंक में छुप गए .कई घंटो तक पैर से खून बहते रहे कान में बहुत दर्द के बावजूद उन्होंने ठन्डे पानी के उस टैंक में कई घंटे गुजारे . टैंक का ढक्कन उठाकर जब वह बाहर आये तो देखा के चारों तरफ लाशें हे लाशें पड़ी हुई थीं .जिन औरतों का दामन तार - तार हो चुका था वह आखरी सांसें गिन रहीं थीं .बलात्कार के बाद खूंखार दरिंदों ने उनके जिस्म के नाजुक हिस्सों में लोहें की छड़ें और लकड़ियाँ घुसा दी थीं .इस दौरान माया कोडनानी की नजर उनपर पड़ी और वह जोर से चींखने लगी के ( " ताजिया "शब्द फसाद  के दौरान मुसलमान की पहचान के लिए खुफिया इशारे के तौर पर किया  गया )गर्ज फसादी उनके तरफ दौर पड़े .नजीर दौरे हुए एक जेरे तामीर मकान में दाखिल हो गए .नजीर ने देखा के वहाँ स्टेट रिज़र्व पुलिस के कुछ जवान चोरी में वेयस्त हैं . ये चोर पुलिस वाले उनके साबेका शागिर्द निकले .उन्हें ओस्ताद (गुरु )पर रहम आ गया .उनहोंने अपने ओस्ताद के लिए खाने और दवा का बंदोबस्त किया  और उन्हें अपने घर में पनाह दी .इस तरह नजीर की जान बच गई और उन्हों ने अदालत में बेख़ौफ़ बयान दिया .उन्होंने नरेंदर मोदी को एक ख़त भी लिखा ,जिसका जवाब उन्हें अभी तक नहीं मिला .बेनजीर ने जो कुछ देखा था ,वह सब अदालत को बताया ,धमकियां और लालच उन्हें रोक नहीं सकी.
                       कभी नंबर 1 जवान नगर , नरौदा पाटिया इलाका के रहने वाले नजीर खान रहीम खान पठान ने जब हम से बात की तो एक भीड़ जमा हो गई , नजीर साहेब बहार कहीं जा रहे थे , मेरे बोलवाने पर लौट कर अपने भतीजे आरिफ की दुकान पर आये और दिन की रोदाद बयान करनी शुरू करदी ,दोकान के तरफ इकठ्ठा हुजूम में से लोगों के रोने की सिसकियाँ लेने की आवाज आने लगीं , पुलिस भी वहाँ पहुँच गई , नरौदा पटिया से निकलने के बाद मेरा और मेरे साथी फोटो जर्नलिस्ट हबीब खान का पीछा किया गया , बन्दर भब्कियों की परवाह न करते हुए हमने रुक कर वहाँ की सबसे अहम् सड़क पर नुरानी मस्जिद और उसके करीब व जवार में पाई जाने वाली दोकानो की तशवीरें लीं. उससे कबल हमने एक और अहम् चश्मदीद गवाह 35 वर्षीय शकीला बानो अंसारी से भी उनके मकान में बैठकर बात चीत की .शकीला बानों ,मरहूम कौसर बानों की खालाजाद बहन हैं की  बहन हैं। जिनकी कोख में जालिम बाबू बजरंगी ने तलवार घोंप कर जिन्दाह बच्चे को निकाल कर तलवार की नोक पर बुलंद करके लहराया था , इस वाकेया को बयान करते हुए शकीला जज्बात से कांपने लगीं , उन्होंने आंसुओ और सिसकियों के दरमयान बताया के जब जालिमों से बचने के लिए घर छोड़कर महल्ले ली की दूसरी तरफ जाने लगे तो सरकारी लिबास में मलबूस दरिंदों ने हमदर्दी दिखाकर मेरी मां के जेवरात उनके बदन से उतार लिए ,उनके पास जो रक़म थी वह छीन ली और फ़सादियों को इशारा कर दिया .
                        भागते हुए जब बेयारों मददगार लोग नरौदा पाटिया के स्टेट आर्म्ड रिज़र्व पुलिस के दफ्तर पनाह लेने पहुंचे तो उन्हें एक और पुलिस वाले ने गेट पर ही रोक दिया  और एक अखबार दिखाते हुए उसने कहा  " देखो ! गोधरा की इस तशवीर को ! कारसेवकों को जिन्दाह जलाया गया है . हम तुम्हारा इससे भी बुरा हाल करेंगे .आज यहाँ (मुसलामानों)को जान से मारना ही है .ये ऑर्डर ऊपर से आया है "शकील उससे सवाल करने लगी के "ऊपर से किसका आर्डर आया है ? " पुलिस वालों ने मज्लुमिन को अन्दर दाखील होने से रोक दिया ,पुलिस के दफ्तर के सामने सैकरों मासूमों को हालाक करदिया गया और पुलिस देखती रही,शकीला ने बताया के उनकी माँ  और उनके भाउज को शहीद  कर दिया ,उस औरत को क़त्ल करने से पहले अजियातनाक मराहिल से गुजारा गया .उनके दो महीने के बच्चे को छीनकर फसादी कहने लगे जब तू ही नहीं रहेगी तो इसको कौन देखेगा ?कुछ केमिकल और पेट्रोल फेंककर आग सुलगाई गई और उसमें उस बच्चे को फेंक दिया गया ,
                      एक दिसंबर 2012 को जुमा के दिन अदालत ने फैसला दिया उसमें फंसादियों को सजाएं सुनाईं गईं .नरौदा पाटिया फिर तनाव पैदा हो गई छाड़ा बेरादरी के सजायाफ्ता दंगाइयों के घर वाले उग्र होकर एक और वासिल जहन्नम फसादी रति लाल राठौर छाड़ा के घर पहुँच कर एहतेजाज करने लगे के इसने और भवानी ने फसाद कराने पर उकसाया था .रति लाल 2006 में संदेहाश्पद अवस्था में मर गया .भवानी की बेटियाँ घर से बाहर  आईं और एहतेजायिओं का धेयान भटकाने के लिए उनहोंने मुसलमानों पड़ोसियों को गाली गलौज देना शुरू किया और मुस्लिम औरतों उनहोंने थूका भी ,पुलिस ने कोई केस उनके खेलाफ दर्ज नहीं किया और तमाशाई बनी रही ,शारांश ये के नरौदा पाटिया के मुसलमान आज भी खौफ और दहशत में जिंदगी बीता रहे हैं और यहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है
                        वकील शमशाद खान पठान ने ठीक ही कहा के फसाद रुक नहीं और अब भी मुसलामानों को निशान बनाया जा रहा है .इसकी एक मिशाल अखबारात के पन्ने उलटने से मालुम पड़  जायेगी .नवम्बर 2009 में गाये चुराने के बहाने पुलिस ने मुसलमानों के घरों में घुसकर महिलाओं के साथ बदतमीजी की जिसे नोटिस लेते हुए अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग गिरिजा वेयास ने यहाँ एक जांच टीम भेजी थी और इस वाकेया की भरपूर आलोचना हुई थी .
                            मैंने इस दौरे में बाज ऐसी बातें सुनी और देखी हैं जिन्हें कलमबंद नहीं किया जा सकता ....अगर मुसलामान गुजरात के फसाद को भूल जाते हैं तो फिर उनकी दास्तान तक भी न होगी दास्तानों में .(उर्दू दैनिक पिन्दार पटना के दिनांक 1 5 .0 1 /2013 से लिया गया है  .) .....   www.biharbroadcasting.com 

गुंडा गर्दी पे लगेगा अब लगाम ,अदालत ने सिखाया सबक !जमिअतुल उलमा को बड़ी कामयाबी ,मुस्लिम नौजवान के घर से जब्त 2 6 लाख रूपये की वापसी की अदालती हुक्म

गुंडा गर्दी पे लगेगा अब लगाम ,अदालत ने सिखाया सबक !जमिअतुल  उलमा को बड़ी कामयाबी ,मुस्लिम नौजवान  के घर से जब्त  2 6 लाख रूपये की वापसी की अदालती हुक्म . 

    मुंबई  2 मई (प्रेस रिलीज़ )समाजी इन्साफ की लड़ाई लड़ने वाली संगठन जमिअतुल    उलेमा महाराष्ट्र (अरसद मदनी )को आज उस वक़्त एक बड़ी कामयाबी मिली जब वह दहशतगर्दी के आरोप में महाराष्ट्र के नान्देर शहर में एक मुश्तबा मुस्लिम नौजवानों की रहाइश गाह पर छापे के दौरान एन आई ए की जानिब से जब्त किये गए तकरीबन 2 6  लाख रूपये को उस नैजवान को वापस किये जाने का हुक्म एक विशेष अदालत ने जारी किया . मुंबई में अखबारात के नाम जारी किये गए अपने बयान में जमिअत के कानूनी सहयेता कमिटी के सरबराह गुलजार आजमी ने बताया के नांदेड शहर में रहाइश पर, 2 5  वर्षीय हाइली क्वालिफाइड (एम् बी ए )मुस्लिम युवा मोहम्मद जकिउद्दिन नेजामुद्दीन के आवास पर  - एन आई ए के दस्ता ने 2 3  अगस्त 2012 को  छापा मारा था ,  और उस दौरान उनहोंने जकिउद्दिन के घर  से , मोबाइल,लैपटॉप ,के अलावा 2 6 लाख रूपये भी जब्त किये थे , जो जकिउद्दिन के के पिता ने पिछले दिनों खानदानी जमीं को बेच कर हासिल की थी , और ये पैसे उनके खानदान के लोगों के बीच बंटने वाले थे , प्राप्त सूचना के मुताबिक़ ताफ्तिशी एजेंसियों ने जकिउद्दिन से विभिन दहशतगर्दी के मामलों के सम्बन्ध में पूछ - ताछ के बाद उसे क्लीन चीट देते हुए उसे रिहा कर दिया गया , लेकिन जाँच एजेंसियां जब्त किये गए रूपये को लेकर मुंबई आ गया था , जकिउद्दिन के खानदान ने दौराने कारवाई जांच एजेंसियों से दरखास्त की थु के जब्त किये रूपये और चाप का पंचनामा करें और उसमें रक़म की जब्ती का विवरण भी दर्ज करें ,जिसके बाद एन आई ए  के अफ्सारान ने पंचनामा में जहां विभिन चीजों का जिक्र किया वहीँ गवाहों की मौजूदगी में 2 6 लाख रूपये  की जिक्र भी किया , ककिउद्दिन से एन आई ए  की तफ्तीश और  फिर उसके मकान से एक बड़ी राशी की जब्ती को लेकर प्रदेश के मराठी और दुसरे अखबारों ने बहुत ही मनगढ़ंत खबरें प्रकाशित की थीं और उसमे कहा गया था के एन आई ए  की तरफ से एक दहशतगर्द के घर पर छापा के दौरान बहुत बड़ी रकम प्राप्त हुई है जो आतंकी कार्रवाइयों में इस्तेमाल होने वाली थीं . 26  लाख रूपये की जब्ती को लेकर और मुस्लिम खानदान को परीशान किये जाने के खेलाफ जमिअतुल उलेमा ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और नामवर वकील एम् एस खान की मदद हासिल की , जिन्होंने एन आई ए के विशेष अदालत जज आई एस मेहता के रु ब रु जांच एजेंसियों की तरफ से की गई मुकम्मल कार्रवाई को गैर कानूनी बताते हुए जब्त की गई रकम की तफ्सीलात फराहम करते हुए अदालत को बताया के ये रक़म जकिउद्दिन के खानदान ने कानूनी तौर पर अपनी एक जयेदाद को बेच कर हासिल की थी और रकम उनके खानदान के बीच बंटने वाली थी अदालत ने एस सम्बन्ध में दस्तावेज के गहन जांच परताल करने के बाद एन आई ए  मुंबई को जब्त किये गए रूपये को जल्द से जल्द  जाकी के खानदान वालों को वापस करने का हुक्म जारी किया .(उर्दू दैनिक पिन्दार पटना दिनांक 03/05/2013 के पृष्ट 6 पर प्रकाशित समाचार से लिया गया है) www.biharbroadcasting.com 



क्या गजरात के मुसलामानों को कभी इन्साफ मील सकेगा ?

                          नरौदा पाटिया दंगा :-नरौदा पाटिया दंगा में 1 5 हजार से जेयादा दंगाई 2 8 फ़रवरी 2002 की सुबह 7 बजे हमला शुरू कर दिए ,1 2 घंटो के नंगा नाच के लिए पूरी तैयारी करली थी ,हिथियार की गाड़ी ,पेट्रोल की गाड़ी ,गैस सेलेंड़ेरों से भरी हुई लारी ,उनके साथ थी दंगाई बारी-बारी आते महिलाओं की इज्ज़त लुटते ,लुट मार मचाते ,हत्या करते और घरों को आग लगा देते थे ,थक जाते तो उनकी जगह दुसरे दंगाइयों की टोली आ जाती ,थके हुए दंगाई नाश्ता करके ,शराब पीकर आराम करके फिर लौट आते ..एक दंगाई की बीवी मुसलमान थी ,लेकिन उसे ये एहसास नहीं हुआ के जिस सख्श के साथ वह जिंदगी गुजार रही है ,वह आदमी उसकी कौम का क़त्ल कर रहा है .बी जी पी ने अपने ही काएद के खानदान को नहीं बख्शा .नजीर खान पठान के वक़्त बी जी पी के मुकामी काएद और कार्यकारणी (मज्लिशे शुरा )के रुक्न (सदस्य  थे आज कल नजीर खान इस्लामिक रिलीफ कमिटी के एकरा स्कूल में केमिस्ट्री और बायोलॉजी पढ़ा रहे हैं .अदालत में वह भी साबित क़दम (मुस्तैदी के साथ डेट रहना )रहे ,पहले वह मैथ के टीचर थे .फ़सादियों ने अपने शिक्षक को भी नहीं छोड़ा .2 8 फ़रवरी को फसाद के दिन पुलिस फायरिंग में एक खाली शेल नजीर खान के कान से टकरा करपैर को जख्मी कर गया ,वह भागने के काबिल नहीं रहे इसलिए अपनी बीवी से कहा के वह उनके बेटे और बेटी को कहीं दूर ले जाकर अपनी और उनकी जान बचाले .बेनजीर अपनी जान बचाने के लिए सड़क के किनारे स्थितसाढ़े चार फिट जमीं के निचे पानी के टैंक में छुप गए .कई घंटो तक पैर से खून बहते रहे कान में बहुत दर्द के बावजूद उन्होंने ठन्डे पानी के उस टैंक में कई घंटे गुजारे . टैंक का ढक्कन उठाकर जब वह बाहर आये तो देखा के चारों तरफ लाशें हे लाशें पड़ी हुई थीं .जिन औरतों का दामन तार - तार हो चुका था वह आखरी सांसें गिन रहीं थीं .बलात्कार के बाद खूंखार दरिंदों ने उनके जिस्म के नाजुक हिस्सों में लोहें की छड़ें और लकड़ियाँ घुसा दी थीं .इस दौरान माया कोडनानी की नजर उनपर पड़ी और वह जोर से चींखने लगी के ( " ताजिया "शब्द फसाद  के दौरान मुसलमान की पहचान के लिए खुफिया इशारे के तौर पर किया  गया )गर्ज फसादी उनके तरफ दौर पड़े .नजीर दौरे हुए एक जेरे तामीर मकान में दाखिल हो गए .नजीर ने देखा के वहाँ स्टेट रिज़र्व पुलिस के कुछ जवान चोरी में वेयस्त हैं . ये चोर पुलिस वाले उनके साबेका शागिर्द निकले .उन्हें ओस्ताद (गुरु )पर रहम आ गया .उनहोंने अपने ओस्ताद के लिए खाने और दवा का बंदोबस्त किया  और उन्हें अपने घर में पनाह दी .इस तरह नजीर की जान बच गई और उन्हों ने अदालत में बेख़ौफ़ बयान दिया .उन्होंने नरेंदर मोदी को एक ख़त भी लिखा ,जिसका जवाब उन्हें अभी तक नहीं मिला .बेनजीर ने जो कुछ देखा था ,वह सब अदालत को बताया ,धमकियां और लालच उन्हें रोक नहीं सकी .  (उर्दू दैनिक पिन्दार पटना के दिनांक 1 5 .0 1 /2013 से लिया गया है  शेष भाग बाद में) .....  www.biharbroadcasting.com