(इंसानियत और इस्लाम की बुनियाद पर मुस्लिम देशों को एक हो जाना चाहिए: एरदोअन - The Siasat Daily )

(इंसानियत और इस्लाम की बुनियाद पर मुस्लिम देशों को एक हो जाना चाहिए: एरदोअन - The Siasat Daily )

October 4, 2016 Khaas Khabar, World 0 Comments

अंकारा: तुर्की के राष्ट्रपति रजब तय्यिप एरदोअन ने इस्लामिक देशों के बीच बेहतर समझ और एकता की बात कही है. कल एक मीडिया चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इस्लामिक देशों को एकजुटता दिखानी चाहिए.

“तुर्की और सऊदी अरब को निशाना बनाया जा रहा है. हम देख रहे हैं कि सारे षड्यंत्र मुस्लिम देशों के ख़िलाफ़ किये जा रहे हैं,” उन्होंने कहा.
सबसे ज़्यादा प्रभावशाली मुस्लिम नेता ने कहा कि सीरिया में 6 लाख से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और अगर अब भी हम एक जुट नहीं हुए तो बहुत देर हो जायेगी.
उत्तरी सीरिया में अमरीका और तुर्की ने ISIL के ख़ात्मे को लेकर अगस्त के आख़िर में ऑपरेशन शुरू किया था. उन्होंने कहा कि तुर्की का इसमें कोई अपना हित नहीं है लेकिन मुसलमान होने के नाते उनकी ये ज़िम्मेदारी है कि लोग अगर सीरिया में परेशान हैं तो उसमें आगे आयें. तुर्की में सीरिया के तक़रीबन 30 लाख रिफ्यूजी हैं जिस पर 12.5 बिलियन अमरीकी डॉलर का ख़र्च हो चुका है. उन्होंने कहा कि ये सब सिर्फ़ इसलिए है क्यूंकि इस्लाम और इंसानियत की बात है.
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों को चाहिए था कि वो रिफ्यूजी लोगों की मदद करें तो वो अपने बॉर्डर बंद कर रहे हैं. इराक़ के हालात पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि मोसुल वहाँ के लोगों का है.
उन्होंने कहा कि मोसुल जब दा’एश (ISIL) से आज़ाद हो जाए तो सिर्फ़ सुन्नी अरब, तुर्की और सुन्नी कुर्द ही वहाँ रहें.
Source :- http://hindi.siasat.com/news/%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A4-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A8-836843/

[सेना पर हमलों को रोक पाना मुश्किल - BBC हिंदी]
रविवार रात बारामूला में सेना के 46 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कैंप के पास इस हमले में अर्ध सैनिक बल के एक जवान की मौत हो गई, जबकि दो जवान घायल हुए हैं. सेना के भी दो जवान घायल हुए हैं.

बीबीसी से बातचीत में भारतीय सेना के पूर्व जनरल बताते हैं कि ऐसे हमलों को रोक पाना मुश्किल है.

Image copyrightMUKHTAR KHAN

पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता के मुताबिक नियंत्रण रेखा पर हर व़क्त चौक़सी बहुत मुश्किल है.

उन्होंने कहा, "अनिश्चितकालीन समय तक सेना की तैनाती नहीं होनी चाहिए, उससे एक थकान ठहरने लगती है, पिछले कई दशकों से वहां तैनात सेना और सुरक्षा बल 100 प्रतिशत मुस्तैद नहीं हो सकते."

नियंत्रण रेखा पर 13 साल पहले 'बार्ब्ड वायर' लगाई गई थी जो जनरल मेहता के मुताबिक अब उतनी सुरक्षित नहीं रही. हालांकि उसपर सेंसर और रडार लगे हुए हैं.
MORE
http://biharbroadcasting.com/blog/viewpost1.php?id=935

[सेना पर हमलों को रोक पाना मुश्किल - BBC हिंदी]

[सेना पर हमलों को रोक पाना मुश्किल - BBC हिंदी]

दिव्या आर्य
संवाददाता, दिल्ली
े
साझा कीजिए
Image copyrightFAROOQ KHAN
भारत प्रशासित कश्मीर के उरी पर हमले में 19 भारतीय जवानों के मारे जाने और पिछले हफ़्ते सेना के नियंत्रण रेखा के पास 'सर्जिकल स्ट्राइक' के दावे के बाद एक बार फिर रविवार रात बारामूला में हमला हुआ है.
भारतीय सेना की उत्तरी कमान ने ट्वीट कर बताया कि "बारामूला में हमला हुआ, हालात काबू में हैं", और वहां पहुंचे गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बयान दिया कि "सेना के जवान ऐसी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं".
लेकिन रविवार रात बारामूला में सेना के 46 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कैंप के पास इस हमले में अर्ध सैनिक बल के एक जवान की मौत हो गई, जबकि दो जवान घायल हुए हैं. सेना के भी दो जवान घायल हुए हैं.
बीबीसी से बातचीत में भारतीय सेना के पूर्व जनरल बताते हैं कि ऐसे हमलों को रोक पाना मुश्किल है.
Image copyrightMUKHTAR KHAN
पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता के मुताबिक नियंत्रण रेखा पर हर व़क्त चौक़सी बहुत मुश्किल है.
उन्होंने कहा, "अनिश्चितकालीन समय तक सेना की तैनाती नहीं होनी चाहिए, उससे एक थकान ठहरने लगती है, पिछले कई दशकों से वहां तैनात सेना और सुरक्षा बल 100 प्रतिशत मुस्तैद नहीं हो सकते."
नियंत्रण रेखा पर 13 साल पहले 'बार्ब्ड वायर' लगाई गई थी जो जनरल मेहता के मुताबिक अब उतनी सुरक्षित नहीं रही. हालांकि उसपर सेंसर और रडार लगे हुए हैं.
साल 1999 में करगिल युद्ध के दौरान सेनाध्यक्ष रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक के मुताबिक सैंकड़ों किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा में से घुसपैठ को पूरे तरीके से रोकना बहुत मुश्किल है.
Image copyrightTAUSEEF MUSTAFA
बीबीसी से बातचीत में जनरल मलिक ने कहा, "कोई भी देश पूरे तरीके से तैनाती नहीं कर सकता, इसलिए जहां ख़तरा ज़्यादा होता है वहां सेना की पोस्ट थोड़ी नज़दीक और बाक़ी जगह थोड़ी दूर बनाई जाती हैं."
इसके बावजूद, जनरल मलिक बताते हैं कि जम्मू के मैदानी इलाकों से लेकर 17-18,000 फ़ीट की ऊंचाई पर जानेवाली नियंत्रण रेखा की सुरक्षा के लिए जवानों के साथ ही तकनीक भी अहम् भूमिका रखती है.
पाकिस्तान से लगने वाली भारत की 3,000 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा का 1,225 भारत प्रशासित कश्मीर, 1,037 राजस्थान, 553 पंजाब और 508 किलोमीटर गुजरात से गुज़रता है.
2015 में गुरदासपुर और इसी साल पठानकोट में भी हमले हुए थे पर पंजाब से सटी सीमा पर नियंत्रण रेखा जैसी 'बार्ब्ड वायर' तक उप्लब्ध नहीं है.
Image copyrightSTR
पठानकोट हमले के बाद सीमा सुरक्षा और भारत-पाक़िस्तान वाली सीमा में घुसपैठ के हालात समझने के लिए अप्रैल 2016 में सरकार ने एक समिति बनाई और अगस्त में उसकी रिपोर्ट आई.
पूर्व गृह सचिव मधुकर गुप्ता की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट में सुझाव दिए गए कि पंजाब से गुज़रने वाली भारत-पाक़िस्तान सीमा पर लेज़र और सेंसर लगाने के अलावा वहां निगरानी भी और मुस्तैद करने की ज़रूरत है.
भारत, पाकिस्तान और सीमापार चरमपंथ से निपटने के लिए स्ट्रैटेजिक रिस्ट्रेंट यानि संयम की नीति अपनाता रहा है.
1999 में करगिल, 2001 में संसद हमला और 2008 में मुंबई हमले के व़क्त भारत ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन नहीं किया.
जनरल अशोक मेहता के मुताबिक इसका असर फ़ौज के मनोबल पर पड़ता है.
Image copyrightAP
इसके अलावा फ़ौज को भारत प्रशासित कश्मीर में स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल नहीं है.
जनरल मेहता ने कहा, "वहां हालात जैसे बना दिए गए हैं, लोग आतंकवादियों को हीरो मानते हैं, फ़ौज को बैरक्स में रहना पड़ता है क्योंकि बाहर आने से माहौल में तनाव बढ़ सकता है, तो ऐसे में वो ख़ुफ़िया जानकारी कैसे जुटाएंगी और आतंकवादियों से निपटने का काम कैसे करेंगी?"
भारत प्रशासित कश्मीर में आंतरिक अस्थिरता का उल्लेख देते हुए जेनरल मेहता कहते हैं कि इसका असर सुरक्षा बलों पर भी पड़ता है. वहीं द्विपक्षीय स्तर पर बातचीत को लेकर कोई अनुरूपता नहीं है.
एक ओर प्रधानमंत्री मोदी प्रधानमंत्री शरीफ़ को शपथ ग्रहण के लिए न्योता देते हैं और ख़ुद वहां पाकिस्तान जाते हैं.
दूसरी ओर हुर्रियत का हवाला देकर बातचीत रद्द होती है और पठानकोट हमले के बाद आईएसआई को आने दिया जाता है.
Image copyrightREUTERS
जनरल वी पी मलिक के मुताबिक दोनों देशों के बीच बातचीत पाकिस्तानी सेना के हक़ में नहीं है क्योंकि ये उनके देश में उनके रसूख़ को कम करेगा.
पर वो दावा करते हैं कि पाकिस्तान के मुकाबले भारतीय सेना के पास बेहतर तकनीक और हथियार हैं. फिर भी चरमपंथी गुटों की चुनौती अलग ही है.
वो कहते हैं, "इन गुटों को ना सिर्फ़ पाकिस्तानी सेना से मदद मिलती है, बल्कि उनके पास देश-विदेश से बहुत पैसा मिलता है जिससे हथियार और बाक़ि असला आराम से ख़रीदा जा सकता है.
http://www.bbc.com/hindi/india-37541973

शहाबुद्दीन का क़ुसूर क्या है?

Seraj Anwar
शहाबुद्दीन का क़ुसूर क्या है?
देश में एक नहीं दो शहाबुद्दीन हैं . एक सैयद शहाबुद्दीन हैं . गया से संबंध है. मृत्युशैया पर हैं . एक हैं मोहम्मद शहाबुद्दीन ग्यारह वर्सों से जेल में बंद हैं. सिवान से आते हैं . दोनो ने देश की राजनीति ( मुस्लिम सियासत) को बदलने का प्रयास किया. देश को ये बर्दाश्त नहीं है. मुस्लिम क्यादत उभरे . सैयद शहाबुद्दीन को जिन्ना की संज्ञा दी गयी मतलब भारत मुख़ालिफ़ , नफ़रत के पात्र. बचे मोहम्मद शहाबुद्दीन , अपराधी ठहरा दिया गया. सैयद शहाबुद्दीन और मोहम्मद शहाबुद्दीन भारतीय राजनीति के नब्ज़ को परख नहीं पाए , उन्हें शाज़िशन जिस रास्ते पर ढकेला गया वे भी उसी रास्ते पर बढ़ते चले गए. नतीजतन, मास में उम्मीद जगाने के बावजूद नेता नहीं बन पाए. आज सैयद शहाबुद्दीन बुरी तरह से बीमार हैं , कोई पुरसानहाल नहीं है. जो लोग मोहम्मद शहाबुद्दीन को अपराधी मानते हैं वे शिच्छाविद सैयद शहाबुद्दीन के साथ खड़ा हुए? असद उद्दीन अवैसी के साथ कहाँ खड़ा है? आज मुसलमानो में मोहम्मद शहाबुद्दीन के अपराधी होने पर ज़ोरदार बहस चल रही है. मेरी समझ भी कहती है कि अपराधी प्रवृति वाले लोग मुसलमानों के नेता नहीं हो सकते. मगर मुसलमानों और भारतीय समाज से मेरा एक सवाल है राजनीति में अपराधी राज कर रहे हैं या नहीं? बालठाकरे से लेकर राजा भैया तक की दास्तान भरी पड़ी है. संजय गांधी और अमीत शाह को भी इसी श्रेणी से जोड़ कर देखा जाता है. तो शहाबुद्दीन पर इतना बवाल क्यों है? बवाल की वजह जानिए. यदि शहाबुद्दीन अपराधी हैं तो पक्के नमाज़ी भी हैं , शराबी नहीं हैं , कबाबी - शबाबी नहीं हैं . सिर्फ़ सिक्के के एक पहलू को उछाला जा रहा है .शहाबुद्दीन का क़ुसूर ये है की सिवान में सैंकड़ों एकड़ भूमि पर एजुकेशनल कैम्पस का बुनियाद रखना चाह रहे थे , कार्यारंभ भी हो चुका था , शासक वर्ग को ये बात चुभ गयी . झगड़े की असल जड़ यही है . उनका क़ुसूर ये भी है की अपने सांसद काल में MP fund का पैसा पाईं पाईं ख़र्च कर रेकार्ड क़ायम कर मिशाल पेश की. क़ुसूर ये भी है कि जल्लाद डाक्टरों की फ़ीस तय कर दी. क़ुसूर ये भी है कि सत्ता की चौखट पर नतमस्तक होने की आदत नहीं है . ख़ुद को रॉबिन हुड से भी ज़्यादा अलेक्ज़ेंडर मानते हैं . प्रस्तिथिवश बात नहीं करते . उन्हें शायद जेल ज़्यादा शूट करता है . मगर मास में ज़बर्दस्त पकड़ है . आज गया से लेकर गोपालगंज, सिवान , दिल्ली , पटना में न्याय दिलाने को लेकर मशाल जुलूस निकल रहे हैं तो शहाबुद्दीन में कोई बात ज़रूर है . जुलूस में शामिल सब अपराधी तो नहीं ही होंगे? वैसे याक़ूब मेनन के जनाज़े में शामिल हज़ारों लोगों को संघ संपोषित मीडिया ने आतंकवादी ही ठहरा दिया , इस रोग का कोई ईलाज नहीं है . दावा के साथ कहा जा सकता है कि शहाबुद्दीन केलिए न्याय माँग रहे अधिकतर लोगों का वास्ता शहाबुद्दीन से ना होगा और ना शहाबुद्दीन उनको जानते होंगे . जेल से रिहाई के दौरान जितने लोग भागलपुर गए उन्हें शहाबुद्दीन ने तो नहीं ही बुलाया होगा ? कोई निमंत्रण पत्र छपने की ख़बर तो कम से कम मुझे नहीं है . नीतीश कुमार के एक मंत्री जेल में शहाबुद्दीन से मिलने गए , शहाबुद्दीन का क्या क़ुसूर है ? हाई कोर्ट ने ज़मानत दे दी , शहाबुद्दीन का क्या क़ुसूर है? उस जज साहब से किसी ने नहीं पूछा (सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं) ज़मानत देने का आधार क्या था. जब शहाबुद्दीन सरकार बचाए , तब अपराधी नहीं . जब शहाबुद्दीन महागठबँधन केलिए सलाखों के पीछे से अपने रसूख़ का इस्तेमाल वोट दिलाये , तब अपराधी नहीं. जब चंदा बाबू अपनी दुकान का उद्घघाटन केलिए साहेब को बुलाये , तब अपराधी नही . जब नक्सल मूव्मेंट ( माले) से स्वर्ण हिन्दुओं को बचाये , तब अपराधी नहीं . आँख देखाए तो अपराधी , शिक्षा की बात करे तो अपराधी . अपने संसदीय छेत्र में नियम क़ानून की बात करे तो अपराधी और सबसे बढ़ कर जब शहाबुद्दीन की ज़रूरत ना हो तो अपराधी . यही क़ुसूर है शहाबुद्दीन का. शहाबुद्दीन को भी चाहिए की रॉबिनहुड की छवि त्याग कर बिहार और मुसलमानो की राजनीति करें . मगर ये उनसे हो पाएगा कि नहीं संदेह है
https://mobile.facebook.com/story.php?story_fbid=919386611525570&id=100003627191134&_rdr#919427194854845

इसलिए अमेरिका-चीन नहीं छोड़ रहे पाक का साथ, दशकों बाद रूस भी आया करीब, फेल हो रही मोदी की विदेश नीति..? ( गौतम चौधरी )

Shahid Sayyidain
इसलिए अमेरिका-चीन नहीं छोड़ रहे पाक का साथ, दशकों बाद रूस भी आया करीब, फेल हो रही मोदी की विदेश नीति..?
( गौतम चौधरी )
-------------
इन दिनों लगातार प्रचार यह किया जा रहा है कि भारत के साथ
संयुक्त राज्य अमेरिका का जो हाल के दिनों में साजो-सामान आदान-
प्रदान सहमति करार (एलईएमओए) हुआ है वह अपरिहार्य
था और उसके अलावा भारत के पास और कोई दूसरा विकल्प
ही नहीं था। यह भी
प्रचारित किया रहा है कि चीन व पाकिस्तान
की दोस्ती और उस दास्ती में
रूस का तीसरा साझेदार बनकर उभरना, भारत के
सामरिक हितों पर चोट पहुंचा रहा था।
ऐसे में भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार के
लिए एकमात्र रास्ता संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ का सैन्य
समझौता ही बचता था और उस एक मात्र रास्ते को
नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय
लोकतांत्रिक सराकर ने अपनाया, जो सही समय पर
लिया गया सही रणनीतिक फैसला है। इस
फैसले को लेकर भारत के तमाम समाचार माध्यमों में माहौल
भी बनाये जा रहे हैं। अंग्रेजी से लेकर
तमाम भारतीय भाषाओं में आलेख लिखे जा रहे हैं।
कुछ समर्थन में तो विरोध में, लेकिन उन आलेखों को
बारीकी से पढ़ने पर एक ही
बात ध्यान में आती है कि यह तमाम उपक्रम
भारत-अमेरिका सैन्य रणनीतिक समझौते को
स्वीकार्यता प्रदान करवाने के अलावा और कुछ
नहीं है।
यह समझौता भारत के लिए कितना हितकर है, यह मामला तो है
ही लेकिन यह समझौता खुद अमेरिका के लिए कितना
गंभीर है उसे समझने की जरूरत है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस समझौते के
कांलांतर में गंभीर परिणाम हमें भुगतने पड़ सकते
हैं। प्रचारित यह किया जा रहा है कि इस समझौते के बाद हम
नाटो देशों से ज्यादा रणनीतिक दृष्टि से अमेरिका के
नजदीक हो गए हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि
आज भी संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए पाकिस्तान
उतना ही अहम है जितना आज से 10 साल
पहले था। आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान की
अर्थव्यवस्था में अमेरिका की बड़ी भूमिका
है।
कुछ ही समय पहले यानी
की 15 अगस्त को हमारे प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी जी ने बलूचिस्तान पर बयान
दिया और कहा कि वहां की स्वतंत्रता
की लड़ाई में भारत बलूचियों का सहयोग करेगा। दूसरे
दिन ही अमेरिका हवाले से खबर आ
गयी कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का आंतरिक मामला है
और हम उसमें किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप
नहीं कर सकते हैं। पूरी दुनिया
जानती है कि पाकिस्तान और चीन हमारे
लिए दुश्मन राष्ट्र हैं, बावजूद उसके आज भी
अमेरिका पाकिस्तान को सहायता पर सहायता दिए जा रहा है। अब
यह कैसे भरोसा किया जाए कि विपरीत परिस्थिति में
अमेरिका भारत का सहयोग करेगा?
दूसरी ओर तुर्की, सीरिया,
मिश्र, इरान, इराक, इटली, फ्रांस, जर्मनी
आदि देषों के रशियन खेमे में चले जाने के बाद से अमेरिका बुरी तरह घबराया हुआ है। फिलिपींस
जैसे छोटे देशों में भी अमेरिका का प्रभाव कम होने लगा है। इस बीच दक्षिण चीन सागर का
पंगा अलग से खड़ा हो गया है। दूसरा मोर्चा उत्तर कोरिया ने खोल दिया तो तीसरा मोर्चा रूस खेले हुए है। रूस का प्रभाव धीरे-धीरे ही सही बढ़ने लगा है। एशिया में रूस और चीन की दोस्ती के कारण अमेरिकी प्रभाव कम होने लगा है। अमेरिका के दो प्रभावशाली दोस्त इजराइल और सउदी अरब दोनों अब रूस के सामने घुटने टेकने को मजबूर होने लगे हैं।
कुछ ही समय पहले यानी की 15 अगस्त को हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने बलूचिस्तान पर बयान दिया और कहा कि वहां की स्वतंत्रता
की लड़ाई में भारत बलूचियों का सहयोग करेगा। दूसरे दिन ही अमेरिका हवाले से खबर आ
गयी कि बलूचिस्तान पाकिस्तान का आंतरिक मामला है और हम उसमें किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान और चीन हमारे लिए दुश्मन राष्ट्र हैं, बावजूद उसके आज भी अमेरिका पाकिस्तान को सहायता पर सहायता दिए जा रहा है। अब
यह कैसे भरोसा किया जाए कि विपरीत परिस्थिति में अमेरिका भारत का सहयोग करेगा?
दूसरी ओर तुर्की, सीरिया, मिश्र, इरान, इराक, इटली, फ्रांस, जर्मनी आदि देषों के रशियन खेमे में चले जाने के बाद से अमेरिका बुरी तरह घबराया हुआ है। फिलिपींस जैसे छोटे देशों में भी अमेरिका का प्रभाव कम होने लगा है। इस बीच दक्षिण चीन सागर का पंगा अलग से खड़ा हो गया है। दूसरा मोर्चा उत्तर कोरिया ने खोल
दिया तो तीसरा मोर्चा रूस खेले हुए है। रूस का प्रभाव धीरे-धीरे ही सही बढ़ने लगा है। एशिया में रूस और चीन की दोस्ती के कारण अमेरिकी प्रभाव कम होने लगा है। अमेरिका के दो
प्रभावशाली दोस्त इजराइल और सउदी
अरब दोनों अब रूस के सामने घुटने टेकने को मजबूर होने लगे हैं।
यकीनन, यदि वे दोनों रूस के सामने घुटने ना टेकें तो
आने वाले समय में इनकी अर्थव्यवस्था पर इसका
प्रतिकूल असर होगा और ये दोनों राष्ट्र व्यापारिक दृष्ट्रि से इतने
संवेदनशील हैं कि अपने  आर्थिक हितों
की शर्तों पर अमेरिकी दोस्ती
को बहुत दिनों तक कायम नहीं रख सकते हैं,
इसलिए उन दोनों राष्ट्रों ने रूस के प्रति लचीला रूख
अख्तियार करना प्रारंभ कर दिया है।
इस प्रकार की वैश्विक परिस्थिति में भारत-अमेरिका के
साथ रणनीतिक सैन्य समझौता करता है, तो यह
कितना खतरनाक साबित होगा इसकी कल्पना
नहीं की जा सकती है।
रही बात चीन, पाकिस्तान और रूस के
त्रिकोणीय संबंधों का, तो नरेन्द्र मोदी के
नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक
गठबंधन की सरकार अपने पहले दिन से
ही अमेरिका-परस्त दिखने लगी
थी। हथियारों के मामले में
खरीदारी करना और बात है, लेकिन
अमेरिकी हितों के लिए ब्रिक्स जैसे आर्थिक-सामरिक-
रणनीतिक संगठनों को तीलांजलि देने
की कोशिश करना स्वाभाविक रूप से हमारे पारंपरिक
मित्रों को परेशान करेगा। यही कारण है कि रूस ने
तीन से चार दशक बाद पाकिस्तान के साथ न केवल
हथियार बेचने का समझौता किया अपितु सैन्य समझौता
भी करने को मजबूर हुआ।
जब भारत को अमेरिका की जरूरत थी तब
अमेरिका और उसके तमाम दोस्त, इजराइल को छोड़कर भारत के
खिलाफ मोर्चा खेले रखा, लेकिन अब दुनिया बिल्कुल बदल
चुकी है। अमेरिका ताश के पत्तों की
तरह ढहने लगा है। उसे पता है कि ऐसी परिस्थिति
से उसे केवल और केवल भारत ही निकाल सकता
है, तब जाकर वह भारत के साथ दोस्ती का हाथ
बढ़ाने के लिए मजबूर हुआ है, लेकिन हमें अमेरिकी
गलबहिया त्यागकर वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर
अपनी रणनीति बनानी चाहिए
थी। लेकिन हमारे रणनीतिक योद्धा इस
मोर्चो पर भी परास्त हुए और एक बार फिर से हम
चैराहे पर आकर खड़े हो गये हैं।
बहरहाल, जो लोग आज सत्ता में हैं उन पर भरोसा न करने का
कोई तुक नहीं है, लेकिन जो परिस्थितियां सामने है
उसमें भारत को अपने पुरानी रणनीति पर
कायम रहने की जरूरत है। अमेरिका के साथ
दोस्ती तो बेहद जरूरी है लेकिन पारंपरिक
मित्र राष्ट्रों की दोस्ती की
शर्तों पर अमेरिकी दोस्ती को आगे
नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। हमारे
प्रधानमंत्री बेहद समझदार हैं। उनके पास जो
टीम है वह भी समझदार लोगों
की है लेकिन दो ध्रुवीय हो रहे विश्व
में एक वैश्विक ताकत की पक्षकारी,
सामरिक रणनीतिकारों की सोच पर सवाल
जरूर खड़ा करती है। ं

https://mobile.facebook.com/story.php?story_fbid=10205744093080821&id=1810754538&refid=17&_ft_=top_level_post_id.10205744093080821%3Atl_objid.10205744093080821%3Athid.1810754538%3A306061129499414%3A2%3A0%3A1477983599%3A5552066514040891869&__tn__=%2As